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डॉ प्रभात मेमोरियल हीरामती हॉस्पिटल एक संघर्ष एक सपना

एक अस्पताल की नहीं, बिहार के सपनों की लड़ाई
बिहार के युवाओं पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि वे अवसर मिलते ही राज्य छोड़ देते हैं। लेकिन कभी-कभी कोई युवा इस प्रवृत्ति के विरुद्ध खड़ा होता है। वह बड़े शहरों की चमक-दमक छोड़कर अपने राज्य में कुछ नया करने का सपना देखता है। अपनी मेहनत, प्रतिभा और भरोसे के दम पर निवेशकों को जोड़ता है, एक संस्थान खड़ा करता है और लोगों की सेवा का संकल्प लेता है।

ऐसी ही एक कहानी है प्रभात मेमोरियल हॉस्पिटल और उसके संचालक डॉ. सतीश कुमार सिंह की।

डॉ. सतीश कुमार सिंह राजपूत समाज से आते हैं, लेकिन उन्होंने अपने अस्पताल का नाम अपने समाज के किसी व्यक्ति के नाम पर नहीं रखा। उन्होंने इसे बिहार के प्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ स्वर्गीय डॉ. प्रभात कुमार की स्मृति को समर्पित किया, जो सिवान जिले के बसंतपुर के निवासी थे और भूमिहार समाज से आते थे। यह निर्णय बताता है कि चिकित्सा, सेवा और सम्मान की कोई जाति नहीं होती। प्रतिभा और योगदान ही किसी व्यक्ति की असली पहचान होती है।

लेकिन दुखद यह है कि जिस संस्थान को लोगों की सेवा और बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए खड़ा किया गया, वह आज संघर्ष के दौर से गुजर रहा है। आरोप, अफवाहें, नकारात्मक प्रचार और सोशल मीडिया पर बार-बार दोहराए गए दुष्प्रचार ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि एक पूरे संस्थान की साख पर प्रश्नचिह्न लग गया। अक्सर समाज में एक झूठ को इतनी बार दोहराया जाता है कि वह सच जैसा प्रतीत होने लगता है। इसी मानसिकता का शिकार यह अस्पताल भी हुआ।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कितने लोगों ने स्वयं अस्पताल जाकर देखा? कितने लोगों ने तथ्यों की पड़ताल की? कितनों ने यह जानने की कोशिश की कि जिन आरोपों को सच माना जा रहा है, वे वास्तव में कितने प्रमाणित हैं? लेकिन अफवाहें तथ्यों से कहीं तेज दौड़ती हैं और उनका सबसे बड़ा नुकसान उन लोगों को होता है जो कुछ नया करने की कोशिश कर रहे होते हैं।

आज स्थिति यह है कि निवेशक पीछे हट रहे हैं, संसाधन सीमित हो रहे हैं और एक प्रतिभाशाली युवा चिकित्सक का सपना दम तोड़ने की कगार पर दिखाई दे रहा है। यह केवल एक अस्पताल का संकट नहीं है, बल्कि यह उस सोच के लिए भी चुनौती है जो बिहार में निवेश, रोजगार और आधुनिक संस्थान खड़े करने का साहस करती है।

समाज के प्रभावशाली लोगों, बुद्धिजीवियों, चिकित्सकों और विशेष रूप से राजपूत समाज के उन सक्षम एवं संपन्न लोगों से आग्रह है जो चाहते हैं कि बिहार में उनके समाज के युवा आगे बढ़ें, रोजगार सृजित करें और अपने राज्य में ही अवसरों का निर्माण करें—वे इस कठिन समय में आगे आएं। किसी व्यक्ति का समर्थन करने से पहले तथ्यों को देखें, संस्थान के कार्यों का मूल्यांकन करें और फिर निर्णय लें।

यदि आज एक संघर्षरत संस्थान को केवल अफवाहों के आधार पर समाप्त होने दिया गया, तो कल कोई दूसरा युवा बिहार में निवेश करने, अस्पताल खोलने, उद्योग लगाने या नया उद्यम शुरू करने का साहस नहीं जुटा पाएगा।

प्रभात मेमोरियल हॉस्पिटल को बचाने की लड़ाई केवल एक अस्पताल को बचाने की लड़ाई नहीं है। यह बिहार में सपने देखने, जोखिम उठाने और समाज के लिए कुछ नया करने की हिम्मत को बचाने की लड़ाई है।

समय आ गया है कि हम अफवाहों से नहीं, तथ्यों से निर्णय लें; और निराशा से नहीं, निर्माण की भावना से समाज का भविष्य तय करें।ध्यान रहे कि किसी व्यक्ति, संस्था या घटना के बारे में आरोपों को तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने से पहले उनके प्रमाण और कानूनी स्थिति की पुष्टि करना आवश्यक होता है। इसलिए सार्वजनिक लेखन में "साजिश", "झूठा प्रचार" या "दोषी" जैसे शब्दों का प्रयोग आरोप या धारणा के रूप में करना अधिक उचित रहता है, जब तक कि उनके समर्थन में पुष्ट प्रमाण उपलब्ध न हों।

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