#पश्चिम_बंगाल की #राजनीति : #हिंदी भाषियों की छाया, #वाम की विरासत और #ममता के बाद की #चुनौती
(अनूप नारायण सिंह)पश्चिम बंगाल की राजनीति को अगर ठीक से समझना है, तो उसे सिर्फ राजनीतिक दलों के चश्मे से नहीं, बल्कि जनसंख्या, भाषा, श्रम और इतिहास के लंबे प्रवाह से देखना होगा। यह वह प्रदेश है, जहाँ बाहर से आए लोग “बाहर” नहीं रह गए—यहीं के होकर रह गए। खासकर हिंदी भाषी, और उनमें भी बिहार के लोग, जिन्होंने इस प्रदेश की सामाजिक और राजनीतिक संरचना को चुपचाप, लेकिन गहराई से प्रभावित किया।जूट मिल से राजनीति तक : बिहार की श्रमशील उपस्थिति.आज से सौ–डेढ़ सौ साल पहले जब हुगली के किनारे जूट मिलों की कतारें खड़ी हुईं, तब श्रम की सबसे बड़ी आपूर्ति बिहार, पूर्वी यूपी और झारखंड से आई।हावड़ा, हुगली, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना—इन इलाकों की जूट मिलों में काम करने वाले हजारों मजदूर बिहार के गांवों से आए। शुरुआत में ये लोग कमाने आए थे, लेकिन धीरे-धीरे यहीं बस गए।
इनकी दूसरी और तीसरी पीढ़ी आज पूरी तरह बंगाल की नागरिक है—मतदाता है, यूनियन का हिस्सा है और अब राजनीति की निर्णायक ताकत भी।यही वह सामाजिक आधार था, जिस पर वामपंथ ने दशकों तक अपनी राजनीति खड़ी की।वामपंथ : श्रमिक राजनीति से सत्ता तक।1977 से लेकर 2011 तक पश्चिम बंगाल में वामपंथ का शासन सिर्फ सत्ता नहीं था, वह एक सिस्टम था।सीटू, एटक जैसे ट्रेड यूनियन संगठनों में हिंदी भाषी मजदूरों की बड़ी भूमिका रही। जूट मिलों से लेकर बंदरगाह तक, रेलवे से लेकर निर्माण क्षेत्र तक—हिंदी भाषी मजदूर वामपंथ की “फुट सोल्जर” थे।
दिलचस्प तथ्य यह है कि उस दौर में भी केंद्र की राजनीति का बंगाल पर खास असर नहीं पड़ा। दिल्ली में सरकार कोई भी रही हो—बंगाल में फैसला कोलकाता से ही होता रहा।ममता बनर्जी : वाम विरोध से जनआंदोलन तक।2011 में ममता बनर्जी का उभार सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि राजनीतिक संस्कृति में बदलाव था।उन्होंने वामपंथ की जड़ता के खिलाफ भावनात्मक राजनीति की—“माटी, मानुष, बंगला” का नारा दिया।
हिंदी भाषियों को सीधे निशाने पर नहीं लिया गया, लेकिन बंगाली अस्मिता को केंद्र में रखा गया। इसके बावजूद, ममता बनर्जी ने यह समझा कि शहरी कोलकाता, हावड़ा और औद्योगिक इलाकों में हिंदी भाषी मतदाता निर्णायक हैं।इसी कारण तृणमूल कांग्रेस ने हिंदी पट्टी के नेताओं को टिकट भी दिया और संगठन में जगह भी।कोलकाता सिर्फ राजधानी नहीं, एक राजनीतिक स्मृति है।कॉलेज स्ट्रीट की किताबों की दुकानें, कॉफी हाउस की बहसें, श्यामबाजार से लेकर बुर्राबाजार तक की गलियाँ—यहाँ राजनीति सांस लेती है।बुर्राबाजार और पोस्टा जैसे इलाके पूरी तरह हिंदी भाषी व्यापारिक वर्ग के हैं, जिनका झुकाव परंपरागत रूप से कांग्रेस, फिर वाम और अब धीरे-धीरे बीजेपी की ओर बढ़ा है।भाषा, बांग्लादेशी मुद्दा और वाटर टेस्टिंग की राजनीति।पिछले कुछ वर्षों में बांग्लादेशी घुसपैठ, भाषा की राजनीति और नागरिकता का सवाल तेज़ हुआ है।बीजेपी इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और पहचान के मुद्दे से जोड़ती है।वाटर टेस्टिंग, आधार–वोटर लिस्ट सत्यापन जैसे मुद्दों पर चर्चा ने शहरी हिंदी भाषी और सीमावर्ती इलाकों में बीजेपी को लाभ की स्थिति में जरूर पहुँचाया है।लेकिन यह लाभ स्थायी होगा या नहीं—यह बड़ा सवाल है।कांग्रेस और प्रशांत किशोर : एक प्रयोग की तलाश।कांग्रेस बंगाल में आज भी ऐतिहासिक स्मृति है, संगठन नहीं।ऐसे में अगर कांग्रेस प्रशांत किशोर जैसे रणनीतिकार का सहारा लेती है, तो वह शहरी मध्यवर्ग और अल्पसंख्यक वोट में फिर से कुछ जगह बना सकती है।हालांकि यह लड़ाई सीधी ममता बनर्जी से है, न कि बीजेपी से।आगामी विधानसभा चुनाव : त्रिकोणीय नहीं, बहुस्तरीय मुकाबलाआने वाला विधानसभा चुनाव सिर्फ टीएमसी बनाम बीजेपी नहीं है।
यह मुकाबला है—वाम की स्मृति बनाम ममता की पकड़
बंगाली अस्मिता बनाम हिंदी भाषी राजनीतिक चेतना
स्थानीय राजनीति बनाम राष्ट्रीय नैरेटिव।इतिहास गवाह है कि पश्चिम बंगाल ने कभी भी दिल्ली के इशारे पर राजनीति नहीं की।यहाँ फैसला आज भी कोलकाता की गलियों, चाय की दुकानों और मजदूर बस्तियों में होता है।
और शायद इस बार भी—बिहार से आए, लेकिन बंगाल के होकर रह गए लोग—इस फैसले में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।
#अनूप

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