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क्या अब भाजपा को ही आगे आकर ममता बनर्जी के दाँव से कांग्रेस को बचाना होगा ?


राजनीति भी गजब चीज है! कब कौन किसके पाले में होगा ! कौन कब विरोध में आ जायेगा ! कुछ कहा नहीं जा सकता।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और चुनावी स्ट्रैटेजिस्ट माने जाने वाले प्रशांत किशोर ने अब ऐसा दांव चल दिया है कि कभी "कांग्रेस मुक्त भारत" का नारा देने वाली भाजपा को ही अब आगे आकर कांग्रेस को मिटने से बचाना पड़ सकता है।

राजनीति में "जनता का वोट" और "सत्ता पाने का समीकरण" - ये दो चीजें ही सबकुछ तय करती हैं।

कल जो विरोधी थे, आज दोस्त हो सकते हैं। कल जो दोस्त थे, आज विरोधी बन सकते हैं। सत्ता का रास्ता दिख जाए तो सारी विचारधाराएं ताक पर रख दी जाती हैं।

इन्हीं सब चीज का नाम राजनीति है। इसलिए कहा गया है कि राजनीति में न कोई स्थाई दुश्मन होता है और न ही कोई स्थाई दोस्त।

अब देखिए न ! भाजपा का संकल्प था - कांग्रेस मुक्त भारत। अभियान चला, आगे बढ़ा, चरम तक पहुंचा .... और जब स्थिति कांग्रेस को समेट देने की आई तो भाजपा के शीर्ष नेतागण रूक गए। वे सोचे कि अगर कांग्रेस खत्म हो गई तो कोई-न-कोई विपक्ष तो उभर ही जायेगा, और क्या पता कि नया विपक्ष कैसा होगा ! कहीं वर्तमान कांग्रेस के नेतृत्व से मजबूत नेतृत्व वाला विपक्ष आ गया तो व्यर्थ में फसाद हो जायेगा। इसलिए अंत में आकर भाजपा ने देश को "कांग्रेस मुक्त भारत" बनाने का विचार त्याग दिया।

भाजपा को विपक्ष के रूप में कांग्रेस पार्टी सबसे ज्यादा पसंद है, और खासकर गांधी परिवार के नेतृत्व वाली कांग्रेस, क्योंकि तब भाजपा का संघर्ष ज्यादा आसान हो जाता है, जीत आसान मालूम पड़ती है, और किसे आसान जीत पसंद नहीं होगी ? इस प्वाइंट ऑफ व्यूह से कांग्रेस पार्टी भाजपा का सबसे पसंदीदा विपक्ष है। भाजपा कभी नहीं चाहेगी कि उसके सामने ममता बनर्जी या अरविन्द केजरीवाल जैसे किसी व्यक्ति के नेतृत्व वाला विपक्षी समूह खड़ा हो।

छोटी-छोटी पार्टियां होने के बावजूद तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने पश्चिम बंगाल और दिल्ली के विगत विधानसभा चुनावों में भाजपा की विशाल तैयारियों को ध्वस्त कर दिया। इन परिस्थितियों में भाजपा कभी नहीं चाहेगी कि विपक्षी पार्टियों के नेतृत्व का जिम्मा ममता बनर्जी अथवा अरविन्द केजरीवाल जैसे लोगों के पास हो।

आम आदमी पार्टी की रणनीतियों को देखकर ऐसा महसूस होता है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने तो 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा सरकार के पलटने की उम्मीद छोड़ दी है। वे धीरे-धीरे देशभर में अपने संगठन का विस्तार कर रहे हैं, और अपना टारगेट 2029 को बना रखा है।

किन्तु ताजा-ताजा बंगाल चुनाव जीतने के बाद प्रशांत किशोर को 2024 में काफी उम्मीदें दिख रही हैं। वे ममता बनर्जी को आगे रखकर 2024 में ही भाजपा के खिलाफ एक मजबूत विपक्षी समूह खड़ा करना चाहते हैं। कांग्रेस की सुस्ती को फुर्ती में बदलने के प्रयासों में विफल प्रशांत किशोर अब विपक्षी नेतृत्व की दौड़ में कांग्रेस को पछाड़ कर ममता बनर्जी को सामने लाना चाहते हैं।

अपना दांव चलने से पहले निश्चित ही प्रशांत किशोर ने सभी तरह की परिस्थितियों का सभी तरह से तुलनात्मक अध्ययन कर लिया होगा। उनकी आतुरता यह बताने के लिए पर्याप्त है कि उन्होंने वर्तमान भारतीय राजनीति की डिमांड को भी समझ लिया है। वे गर्म हो चुके लोहे पर सारी ताकत लगाकर मजबूत वार करना चाहते हैं। उन्होंने कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दलों की रणनीतियों का आकलन कर ममता बनर्जी को आगे लाने का कदम उठाया होगा।

किंतु शायद उन्हें यह आकलन नहीं होगा कि आवश्यकता पड़ने पर भाजपा सोनिया गांधी एवं राहुल के नेतृत्व वाली कांग्रेस को मिटने से बचाने के लिए परदे के पीछे से संकटमोचक की भूमिका का भी निर्वाह कर सकती है। शायद प्रशांत किशोर को यह अंदाजा नहीं होगा कि जब वे कमजोर पड़ चुकी कांग्रेस के सिर पर सवार होना चाहेंगे तो पहले उन्हें कांग्रेस की बजाय भाजपा से दो-दो हाथ करने पड़ सकते हैं।

फिल्मी स्टाइल में कहें तो "कांग्रेस की गिरेबान में हाथ डालने से पहले तृणमूल को भाजपा के चक्रव्यूह से होकर भी गुजरना पड़ेगा," और शायद यह सब देखने-समझने में ही 2024 बीत जायेगा। भय इस बात का भी रहेगा कि होनहार प्रशांत किशोर कहीं भाजपा के चक्रव्यूह के छठे द्वार पर ही न फंस जाएं।

हालांकि भाजपा तो उस अंतिम क्षण में कांग्रेस को बचाने सामने आयेगी, जब उसे लगेगा कि तृणमूल सच में कांग्रेस का गिरेबान पकड़ लेगी, उससे पहले भी तृणमूल को लोहे के अनेकों चने चबाने होंगे।

विपक्षी दलों में से आखिर कौन सा ऐसा दल है जिसके मुखिया प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब नहीं देखते। ऐसे कौन पार्टी प्रमुख हैं जो चाहते हैं कि उनकी बजाय दूसरी विपक्षी पार्टी के नेता प्रधानमंत्री बन जाएं। विपक्षी पार्टियों के नेताओं के आपसी स्वार्थ भाजपा को 2024 में रिपीट करने के लिए पर्याप्त हैं।




(नोट : यह आलेख शिक्षाविद एवं स्वतंत्र पत्रकार धनंजय कुमार सिन्हा के द्वारा लिखा गया है. इसमें व्यक्त किए गये विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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