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बुंदेलखंड में शुरू होगा जल संरक्षण और वृक्षारोपण का खेल


भोपाल (Bhopal), 2 जून। बारिश का मौसम आने को करीब है और सूखा, भुखमरी, बेरोजगारी के लिए बदनाम बुंदेलखंड में जल संरक्षण और वृक्षारोपण के खेल को अंजाम देने की तैयारियां शुरू हो गई हैं। सरकारी बजट से लेकर अन्य मदों से आने वाली राशि पर गिद्धों की तरह लोग नजर टिकाए बैठे हैं।
बुंदेलखंड वह इलाका है जो कभी जल संरक्षण के मामले में समृद्ध हुआ करता था, मगर वक्त गुजरने के साथ यहां के हालात बदल गए और जल संरचनाएं धीरे-धीरे खत्म होती गई। पानीदार इलाका सूखे में बदल गया। आज आलम यह है कि यहां लोगों को कई-कई किलोमीटर दूर तक पीने के पानी के लिए जाना होता है, तो वही खेती के लिए भी पानी आसानी से नहीं मिल पाता। यही कारण है कि इस इलाके को दुनिया में सूखाग्रस्त क्षेत्र के तौर पर पहचाना जाने लगा है।

बुंदेलखंड उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के सात सात जिलों को मिलाकर बनता है। कुल मिलाकर 14 जिले बुंदेलखंड में आते हैं। लगभग सभी जिलों का हाल एक जैसा है। इस इलाके में कभी दस हजार से ज्यादा तालाब हुआ करते थे, उनमें से आधे से ज्यादा तालाब खत्म हो चुके हैं। इस इलाके को लेकर बीते दो दशक की सरकारी और गैर सरकारी योजनाओं पर नजर दौड़ाई जाए तो एक बात साफ होती है कि उत्तर प्रदेश की सरकार हो या मध्य प्रदेश की सरकार दोनों ही राज्यों की सरकारों ने यहां के जल संकट को दूर करने के लिए कई योजनाएं बनाई और करोड़ों रुपए की राशि मंजूर की। वर्ष 2008 में तो 7200 करोड़ से ज्यादा का बुंदेलखंड पैकेज मंजूर किया गया था, इसमें से अधिकांश राशि जल संचय और संरक्षण के साथ जल योजनाओं पर खर्च की गई है। इसके बावजूद अभी पानी के संकट के दौर से गुजर रहा है।

क्षेत्रीय जानकारों की मानें तो बुंदेलखंड में जितनी भी योजनाएं आइर्ं अथवा बजट मंजूर हुआ, उतना इमानदारी से खर्च होता तो तस्वीर ही कुछ और होती, मगर ऐसा हुआ नहीं। सरकारी मशीनरी हो या जिन लोगों पर जन संरक्षण की जिम्मेदारी थी, उन्होंने सिर्फ कागजी तौर पर काम किया है। जो जल संरचनाओं वर्तमान में मौजूद है उनकी दुर्गति होती है, वही दूरस्थ इलाकों में कागजी तौर पर यह बता दिया गया कि जल संरक्षण के बड़े काम हुए हैं मगर सच्चाई कुछ और है। अगर वास्तविक तौर पर सोशल ऑडिट हो जाए और एक-एक जल संरचना का ब्यौरा इकट्ठा किया जाए तो हकीकत सामने आ जाएगी।

बुंदेलखंड के जानकार और पत्रकार रवींद्र व्यास का कहना है की इस इलाके के साथ हमेशा छल हुआ है गर्मी गुजरते ही बरसात आने के पहले जल संरक्षण के नारे गूंजने लगते हैं और वृक्षारोपण की बात जोर-शोर से प्रचारित की जाने लगती है। यह शोर सिर्फ तब तक रहता है जब तक बजट की बंदरबांट नहीं हो जाती। इस साल भी ऐसा ही कुछ होगा इसे नकारा नहीं जा सकता, क्योंकि जल संरक्षण और वृक्षारोपण के पैरोकार सक्रिय हो चले हैं और कार्यशाला से लेकर गांव गांव तक समूहों के गठन के लिए सक्रिय नजर आने लगे हैं।

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